जज और मजिस्ट्रेट में अंतर

 💟👉जज और मजिस्ट्रेट में क्या अंतर है!📚📚


❣️जज 


👉जज हम न्यायाधीश को कहते हैं। जो न्याय करते हैं, ये उन मामलों को देखते हैं जो जो सिविल हैं। जिन्हे उर्दू में दीवानी मामले के नाम से जाना जाता है। ये दंड नहीं देते हैं, केवल न्याय करते हैं। उनके अंतर्गत व्यवहार और जमीन, गोदाद के मामले आते हैं। उनके मामले वे मामले होते हैं, जो अधिकार, अनुतोष या क्षति वृद्धि से जुड़े होते हैं, ये सीपीसी 1908 के सेक्शन 9 के तहत आते हैं।


👉येमे आने वाले मामले जमीन, घर, सम्पत्ति के होते हैं। इनमे अपराध और दंड जैसे मामले शामिल नहीं होते हैं।


❣️मजिस्ट्रेट 


👉मजिस्ट्रेट को दंडाधिकारी भी कहा जाता है, ये क्रिमिनल केस संभालते हैं अर्थात दाण्डिक मामला, जिन्हे उर्दू में फौजदारी मामले के नाम से भी जाना जाता है। उनके तहत वे मामले पेश किए जाते हैं, जिनमें अपराध के लिए प्रावधान है और जिसमें दंड की मांग की जाती है। इसमें चोरी, डकैती, कटल, बलत्कार, दहेज़प्रथा, धुंध जैसे मामले शामिल हैं। ये मामला क्रिमिनल कोर्ट में ले जाए जाते हैं और धार्मिकता भी वहीं अपना फैसला सुनाती है।


💟👉न्यायाधीश और मजिस्ट्रेट के बीच अंतर 


👉जज को हम न्यायाधीश के नाम से और मजिस्ट्रेट को दंडाधिकारी के नाम से भी जानते हैं।


👉जज लोअर लोअर कोर्ट (निचली अदालत) में बैठते हैं जबकि धर्मवादी फर्स्ट क्लास या सेकंड क्लास कोर्ट में बैठते हैं।


👉जज व्यवहारिक और जमीनी मामला संभालता है और मजिस्ट्रेट आपराधिक मामला संभालता है।


👉जज केवल न्याय करता है और निष्पक्षबजा दिलाता है, जबकि धार्मिकता न्याय के साथ दंड भी देती है।


👉 जज के तहत दीवानी मामले आते हैं मजिस्ट्रेट के तहत फौजदारी के मामले आते हैं।


👉जज के पास आने वाले मामलों के लिए सिविल यानी व्यवहार के मामले कहा जाता है जबकि मजिस्ट्रेट के पास आने वाले मामलों में क्रिमिनल केस यानी दाण्डिक मामले कहा जाते हैं।

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